उस पार है मेरे स्वप्न
होंगे क्या वैसे , देखे थे जैसे
उस पार है मेरा चंदा
चमकता है क्या यहाँ जैसा
उस पार है मेरे कल
निकलेंगे क्या आज से बेहतर
खींचता है ज्ञात , चाहे हैं इसमें कांटे कई
डराता है अज्ञात... भले हो उसमे फूल नए
संभवत: इसलिए हैं तुम्हारे काँधे प्यारे
तुम बने सर्वव्यापी , शक्तिशाली प्रभु हमारे
तुम हो मेरा वो वह ...जो मैं न बन पाया कभी
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Thursday, December 16, 2010
Wednesday, December 8, 2010
On your Ground.....
standing on top of precipice
i had nothing but pity
for those down below
slowly the ice melted
erupted sympathy
with warmth of friendships
got enriched with empathy
under severe heat of omnipresent sun
each flake of snow turning into gracious water
i became the river....
now flowing with love ...unbound...unheard of....
forever....rushing to meet you
on your ground .
i had nothing but pity
for those down below
slowly the ice melted
erupted sympathy
with warmth of friendships
got enriched with empathy
under severe heat of omnipresent sun
each flake of snow turning into gracious water
i became the river....
now flowing with love ...unbound...unheard of....
forever....rushing to meet you
on your ground .
साहस, करो एक बार फिर.
संभव नहीं है प्रेम में मोहित हो उड़ना निर्द्वंद
आकाश है सीमित , रिवायतों और रिवाजों में
रिश्तों और स्वार्थों की अनदेखी सी कड़ियाँ ,
बाँध लेती हैं सायास हर अभिव्यक्ति को
टूटी माना जिन्हें , वही जंजीरे अमरबेल की
पाश सी हर बार ,नए रूपों में
ये खुला हुआ समां, यूँ ही हो जाता है गुम
समंदर शांत , रुकी सी नदी ,
हवा का एक कतरा भी नहीं, पंछी चुप
जिंदगी जैसे भूल जाये होना अपना
यादें भी नहीं बाकी...
उजाला चुभता सा , चांदनी सर्द
क्षुब्ध ह्रदय , क्लेशमय आंसू
खीझते स्वयं की लाचारगी पे
भ्रम के कोहरे से धुआं हुआ विश्वास
क्यूंकि भरोसे हालात के होते हैं ग़ुलाम
उस एक पल रुक जाता है सब
दिल के दरवाज़े हो बंद जब
परदे उठाने का साहस, करो एक बार फिर
फैलने दो अपनेपन का उजास ....संभव है निर्दोष प्यार अब भी
आकाश है सीमित , रिवायतों और रिवाजों में
रिश्तों और स्वार्थों की अनदेखी सी कड़ियाँ ,
बाँध लेती हैं सायास हर अभिव्यक्ति को
टूटी माना जिन्हें , वही जंजीरे अमरबेल की
पाश सी हर बार ,नए रूपों में
ये खुला हुआ समां, यूँ ही हो जाता है गुम
समंदर शांत , रुकी सी नदी ,
हवा का एक कतरा भी नहीं, पंछी चुप
जिंदगी जैसे भूल जाये होना अपना
यादें भी नहीं बाकी...
उजाला चुभता सा , चांदनी सर्द
क्षुब्ध ह्रदय , क्लेशमय आंसू
खीझते स्वयं की लाचारगी पे
भ्रम के कोहरे से धुआं हुआ विश्वास
क्यूंकि भरोसे हालात के होते हैं ग़ुलाम
उस एक पल रुक जाता है सब
दिल के दरवाज़े हो बंद जब
परदे उठाने का साहस, करो एक बार फिर
फैलने दो अपनेपन का उजास ....संभव है निर्दोष प्यार अब भी
उत्तर कहाँ हैं .....
प्रश्नों से पशेमान हम
प्रश्न हैं बेकल , पूछे जाने को बेज़ार
प्रश्न बन गए रिवाज़ से ......निभाते हैं सब
प्रश्न हैं बस एक तिनका....सहारा देते सब चैनलों को
कुछ कलाबाजियां, कुछ मशविरे
और फिर 'मुन्नी' ओर 'शीला' के चर्चे
रह जाती है हक्की-बक्की भीड़ ...दिशा की खोज में
और जला पाती है बस मोमबत्तियां
सच कहाँ दीखता है मद्धिम प्रकाश में
भीड़ हो के भी निर्बल....एकाकी सी, लाचार
कभी बजाती है ढोल-ताशे भी
आने वाला कल अवश्य होगा सुनहरा ....
जीतेगा आम आदमी कभी तो
और फिर हो जाती है तितर-बितर
रोज़मर्रा की जद्दो-जहद में आदमियत जाती है बिखर
दंभ में झूमता दुराग्रह , गर्वित है इस बिखरन पर
रक्त चरित्र रचे जा रहे चंहु ओर....
रक्तबीज जी उठता रह रह कर
हथियारों को बल मानने वाली सोच
आज इन्ही से हो गयी निर्बल
फिर शिव की तलाशो , फिर पुकारो काली को
या फिर
हटा दो प्रश्नचिंह किताबों से ...उत्तर की औपचारिकता ही ख़त्म
.
प्रश्न हैं बेकल , पूछे जाने को बेज़ार
प्रश्न बन गए रिवाज़ से ......निभाते हैं सब
प्रश्न हैं बस एक तिनका....सहारा देते सब चैनलों को
कुछ कलाबाजियां, कुछ मशविरे
और फिर 'मुन्नी' ओर 'शीला' के चर्चे
रह जाती है हक्की-बक्की भीड़ ...दिशा की खोज में
और जला पाती है बस मोमबत्तियां
सच कहाँ दीखता है मद्धिम प्रकाश में
भीड़ हो के भी निर्बल....एकाकी सी, लाचार
कभी बजाती है ढोल-ताशे भी
आने वाला कल अवश्य होगा सुनहरा ....
जीतेगा आम आदमी कभी तो
और फिर हो जाती है तितर-बितर
रोज़मर्रा की जद्दो-जहद में आदमियत जाती है बिखर
दंभ में झूमता दुराग्रह , गर्वित है इस बिखरन पर
रक्त चरित्र रचे जा रहे चंहु ओर....
रक्तबीज जी उठता रह रह कर
हथियारों को बल मानने वाली सोच
आज इन्ही से हो गयी निर्बल
फिर शिव की तलाशो , फिर पुकारो काली को
या फिर
हटा दो प्रश्नचिंह किताबों से ...उत्तर की औपचारिकता ही ख़त्म
.
Tuesday, December 7, 2010
Still walking.
In walking towards you,
the world withered away
shivering desires , precious posessions shrank
yearnings ,frictions,attachments...
melted away in air like camphor
somewhere, somehow...forgot the purpose , the attainment
only path remained
and i kept on walking ...step after step
chantings became mumbling
even rosary seemed heavy
just void...filled all blanks...
what do i tell others
which others
what is there to tell.....Void all....
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